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डॉ.अमरेश कुमार सर चर्चित मूर्तिकार हैं और इन दिनों बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के दृश्य कला संकाय से बतौर प्राध्यापक जुड़े हैं। बिहार म्यूजियम में उनकी यह रेट्रोस्पेक्टिव प्रदर्शनी एक महत्वपूर्ण परिघटना के तौर पर कला प्रेमियों के समक्ष उपस्थित है। जिसका एक सिरा मौर्ययुगीन मूर्तिकला परम्परा से जुड़ता है, जो एक तरह से वर्तमान बिहार के मूर्तिकला का सर्वथा गौरवमयी और आरंभिक इतिहास है।

इस तरह से देखा जाए तो यह प्रदर्शनी लगभग दो हजार वर्ष पूर्व के इतिहास का ऐसा पुनः प्रस्तुतिकरण है, जिसमें इस प्रदर्शनी का शीर्षक है मोक्ष। हम जानते हैं कि मोक्ष एक ऐसा दार्शनिक शब्द है जो भारतीय उप महाद्वीप में प्रचलित हिन्दू, बौद्ध तथा जैन धर्मों में प्रमुखता से आता है जिसका अर्थ है मोह का क्षय होना। हमारे शास्त्रकारों ने जीवन के जो चार उद्देश्य बतलाये हैं—वे हैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । इनमें से मोक्ष को परम अभीष्ट अथवा ‘परम पुरूषार्थ’ कहा गया है । मोक्ष की प्राप्ति का उपाय आत्मतत्व या ब्रह्मतत्व का साक्षात् करना बतलाया गया है।

ऐसे में जब कोई कलाकार अपनी प्रदर्शनी का शीर्षक “मोक्ष” रखता है तो यहाँ एक स्वाभाविक सा सवाल बनता है कि मोक्ष की व्याख्याओं के आधार पर क्या हम किसी मूर्तिकला प्रदर्शनी को मोक्ष मान सकते हैं या मानना चाहिए। तो इसका उत्तर है कि हाँ माना जा सकता है या माना ही जाना चाहिए। क्योंकि मोक्ष प्राप्ति की विभिन्न अवधारणाओं में एक अवधारणा ऐसी भी है, जिसके तहत आत्म साक्षात्कार को ही मोक्ष माना गया है। वहीँ वेदान्त में पूर्ण आत्मज्ञान द्वारा मायासम्बन्ध से रहित होकर अपने शुद्ध ब्रह्मस्वरूप का बोध प्राप्त करना ही मोक्ष है। देखा जाए तो यह प्रदर्शनी पूरी तरह से मूर्तिकार अमरेश कुमार के उन आत्म साक्षात्कारों की परिणति है, जिससे वे समय-समय पर गुजरते रहे हैं।

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