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संपादकीय टिप्पणीः एक से अधिक बीवियाँ जहाँ होती हैं, वहाँ पर कोई भी स्त्री अपने पति से प्रेम नहीं करती क्योंकि प्रेम तो अनन्य और अपवर्जक होता है, दूसरे की गुंजाइश ही नहीं होती। पर चूँकि आर्थिक कारणों से स्त्रियाँ लाचार होती हैं तो सौत को न चाहते हुए भी झेल जाती हैं। पर मर्दवादी समाज में पत्नी-प्रेमिका के आशिक को अक्सर रगड़ दिया जाता है और ठीक ही किया जाता है। वह मर्द ही क्या जो अपने एकाधिकार-अनन्याधिकार को बनाए न रख सके। हाँ, अगर बहुत ही शरीफ हो तो तलाक दे दो-त्याग दो वर्ना अपने एकाधिकार को बनाए रखने के लिए ईंट से ईंट बजा दो। हा हा हा
कशिश नेगी
’भाईचारा’ पुरुषों के बीच होता है क्या? लड़की के भाई/पिता व प्रेमी के बीच भाईचारा होता है? बॉस और कर्मचारी के बीच भाईचारा होता है? दो मेल सौतो (सौतन का मेल वर्जन तो बना ही नहीं) भाईचारा होता है? जबकि इस मामले में तो मर्डर तक हो जाते हैं। क्या सो कॉल्ड सवर्ण मर्द, दमित पुरुषों से भाईचारा निभाते हैं? (उल्टा प्रताड़ित करते) एक धर्म के मर्द दूसरे धर्म के मर्दों से भाईचारा निभाते हैं? (लिंच और कर दे रहे) सगे भाई–भाई भी अधिकतर भाईचारा निभाते नहीं दिखते, प्रॉपर्टी के लिए अलग लड़ते? अब ये न कहना शादी के बाद ही भाई प्रॉपर्टी के लिए लड़ते।
इतिहास गवाह है प्रॉपर्टी (सत्ता) के लिए बेटे ने बाप का, बाप ने बेटे का, भाई ने भाई का, चाचा ने भतीजे का, भतीजे ने चाचा का, दामाद ने ससुर का खून बहाया है। फिर ये कौन से भाईचारे की हवा हवाई बात उड़ाई जाती है? फिर ये कौन से मुंह से “औरत ही औरत की दुश्मन“ वाला जुमला फेंक कर मानसिक गुलाम बनाने की रणनीति खेलते हैं?
क्या मां–बेटी दुश्मन होती है? क्या बहन–बहन दुश्मन होती है? जबकि उनके बीच प्रॉपर्टी को लेकर विवाद भी नही होता क्योंकि मालूम है भाई ही हड़प जाएगा। क्या दो सहेलियों में दुश्मनी होती है? हां!!! 2 औरतों जो एक ही पुरुष की पत्नी है या प्रेम करती उनमें ईर्ष्या भावना रहती है जो कि मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से सामान्य और स्वाभाविक ही है। इस स्थिति में तो जैसे की ऊपर लिखा है मर्द लोग मर्डर ही कर डालते हैं। बाकी जो अन्य रिश्ते महिलाओं के बीच मर्दों द्वारा पितृसत्ता को कायम रखने के लिए बनाए गए हैं न, उन रिश्तों का अवलोकन न ही करें।
क्योंकि ऐसे रिश्ते मर्दों के बीच नहीं होते, अगर होते, तो जरूर वो भी उलझनभरे ही होते।
इसीलिए मर्दों द्वारा बने इन वाक्यों को सीरियसली नहीं लेना, ये षड्यंत्र है पितृसत्तात्मक परिवार/शादी बनाए रखने के लिए। ’बहनापा’ शब्द का उदय कर महिलाओं के मन में गिल्ट पैदा कर ये लोग वैवाहिक रिश्तों में ’बहनापा’ चाहते हैं ताकि वैवाहिक संस्था आराम से सही सलामत चलती रहे। अगर ये मर्द सच में ’बहनापा’ बढ़ाना चाहते होते औरतों के बीच तो शादी के बाद मां–बेटी के फोन पर बातें करने पर क्यों गुस्सा जाते हैं? क्यों शादी के बाद औरतों की सहेलियां पड़ोसीनो/बच्चों के दोस्तों की मां तक ही सीमित हो जाती है? उसमें भी वे लोग कभी कभी बातें ही कर सकती हैं ज्यादा घुलमिल जाएं तो मर्दों को टेंशन होने लगती है, और साथ में ट्रिप में तो वो जा ही नहीं सकती।
हां!!! बहनापा होना चाहिए लेकिन यदि किन्हीं कारणों या वैचारिक मतभेदों के कारण 2 औरतों में न बने तो ये सामान्य और स्वाभाविक है इसमें गिल्ट करने वाली या इश्यू बनाने वाली कोई बात नहीं।

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