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हमारा डीएनए हमारे पारंपरिक भोजन से विकसित हुआ है‌! मगर पिछले 500 साल से हमारा भोजन लगातार बदल रहा है और इस नई सदी में यह बदलाव और तेज हुआ है।
अनुवांशिक बदलाव की गति बेहद धीमी होती है और कई पीढ़ियों के बाद इसके लक्षण प्रकट होना शुरू होते हैं। नई चीजों के साथ परिस्थिति संयोजन जिसे अनुकूलन कहते हैं, वह तो जीवित रहने और जीवन प्रत्याशा बढ़ने और प्रजनन दर से ही मान लिया जाता है। मगर डीएनए पर असर एपिजेनिटिक परिवर्तन के रूप में शुरू होता है और उसके असर गहरे अध्ययन से ही सामने आ सकते हैं। शोध बताते हैं कि हमारे अहार में परिवर्तन हमारी कुछ जेनेटिक अभिव्यक्तियों को शुरू या बंद कर सकता है। वह अगली पीढ़ी में पहुंचेंगी या नहीं, इस पर असर डाल सकता है।
प्राचीन भारत में रात्रि भोजन की परंपरा नहीं थी। वे सूर्यास्त से पहले भोजन कर लेते थे। भारतीय समाज में स्टार्टर रात्रिभोज का हिस्सा नहीं थे। वे सुबह के भोजन का हिस्सा थे। छाछ मुख्य भारतीय स्टार्टर था। दूध-भात इस क्षेत्र का मुख्य भोजन था। इसके अलावा उत्तर भारत में मोटे अनाज की रोटियां सीजनल भोजन थीं, जिनके साथ सीजनल तरकारियां होती थीं। इनमें से बहुत सी अब लुप्त हैं, आजकल हम जो सब्जियां खाते हैं, वे पिछले तीन सौ चार सौ साल पहले ही भारत आई हैं और कुछ तो अभी इसी सदी में।
दक्षिण भारत अब भी पारंपरिक भोजन पर कायम है। वहां चावल को लेकर बहुत प्रयोग हुए। उन्होंने दुनिया को अपना भोजन और मसाले दिए और बदले में काफी कम चीजें एडाप्ट कीं।
दूसरी ओर उत्तर में मुगलों के समय भोजन में तेज बदलाव शुरू हुआ और उसकी गति और तेज हो गई है।
क्या भारत में अहार संबंधी अनुवांशिक बदलाव या एपिजेनिटिक परिवर्तन पर कोई शोध हुआ है। अगर किसी की जानकारी में है तो उसके नतीजों से सबको अवगत कराएं। #सुधीर_राघव

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