Total Views: 94

मेरे गांव की पगडंडी

मेरे गांव की पगडंडी भी हमसे कुछ कह जाती हैं

मेरा मन मेरी आँखें भी देखने को तरस जाती हैं

एक इश्क का इजहार करना है इन पगडंडियों से

इन पगडंडियों में हमारी जान बस जाती है।

मेरे गाँव के लिए निकली एक पगडंडी खेतों-मेड़ों की हरियाली में बस जाती है

मेरी जिंदगी के कुछ अहम हिस्से में इन पगडंडियों से होकर गुजर जाती हैं।

गर्मी की कड़ी धूप में सूखकर, गाँव की मुख्य सड़क बन जाती है

बढ़ती है आगे और पेड़ों की छावं में यूं ही आराम करने की तलक लग जाती है।

मिल जाती है भूले-बिसरे गलियों में, बाग-बगीचों में पेड़ों की सुगंध मिल जाती है

गाँव के कच्चे मकानों के मिट्टी की सुगंध से
अपनों-सम्बन्धों से मिलने की ललक लग जाती है।

अपनों से मिलने के बाद सब सही होता है

पगडंडियों पर चलने का मजा ही कुछ अलग होता है

शाम को सब दोस्त मिलकर दरबार लगाते हैं पगडंडियों पर
पंगडडियों भी हमारा बचपना याद दिलाती हैं।

फिर आ जाती है जब जुलाई बाढ़ भी अपना असर दिखा जाती है
पानी की लहरों में पड़कर मिट्टी में
सिमट जाती हैं
पगडडियां भी अपना अस्तित्व खो जाती हैं।

मिटी हुई पगडण्डी कुछ यादों का अहसास कराती है

मेरे गाँव को एक पगडंडी मुझे हर पल बाद आती है।

————–

घाट अस्सी सी शाम, थोड़ा सा सुकून
कुल्हड़ भर चाय, और साथ में तुम…
प्रेमी वार्तालाप का सिलसिला, रूठने समझाने मनाने का दौर
कुल्हड़ भर चाय, और साथ में तुम…
गंगा की लहरों की अटखेलियां, अस्त होता सूरज
कुल्हड़ भर चाय, और साथ में तुम…
छाया कोहरा, ढलता अंधकार कुल्हड़ भर चाय, और साथ में तुम…
फ़िक्र लौट जाने की, पुनः मिलने की उम्मीद
कुल्हड़ भर चाय, और साथ में तुम…
बनारस की लस्सी, और गोदौलिया का पान
अस्सी के कुल्हड़ की चाय, और साथ में हो प्रिय तुम…!
योगेश ‘युग’

—————————
“मुरझाया गुलाब”

जो बीत गया, वो फिर आएगा क्या
कुम्हलाया हुआ गुलाब, फिर से खिल पाएगा क्या
आस में स्थिर हो तुम, सब दर्द-ए-मोहब्बत लेकर क्यों
नेह तेरा जो छूट गया, बताओ वापस आएगा क्या.

बात बिगड़ गई जो, वो बात बन पाएगी क्या
हँस के बात करते थे, वो हंसी फिर आएगी क्या
दिल में एक टीश है, जुदाई-ए-मुरौव्वत लेकर क्यों
प्यार जो तेरा रूठ गया, बताओ फिर से मिल पाएगा क्या…

मुरझाए गुलाब की तरह, रूठे हो तुम
मुरझाया गुलाब फिर, ताजा हो पाएगा क्या
टूटी बिखरी हुई पंखुड़ियां, फिर एकजुट हो पाएंगी क्या
नादानियों को पकड़े हो तुम, मेरा दर्द-ए-कसूर लेकर क्यों
बताओ वो चेहरे की नजाकत, फिर से आ पाएगी क्या…

Leave A Comment