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मलेरिया मादा एनाफीलिज़ मच्छर के काटने के फलस्वरूप होने वाली एक संक्रामक बीमारी है जो कि प्लास्मोडियम फैल्सीपैरम प्रोटोजोआ की वजह से होती है। दुनिया की आबादी का लगभग 40% भाग मलेरिया से प्रभावित होता है जिससे सालाना लगभग 3-5 लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है। यह बीमारी दुनिया भर में मृत्यु दर और रुग्णता के प्रमुख कारणों में से एक है। अफ्रीका में हर मिनट एक बच्चे की मलेरिया से मृत्यु हो जाती है| अगर बच्चों या गर्भवती स्त्रियों को मलेरिया हो जाए, तो उनके लिए ये और भी खतरनाक हो सकता है| मादा ‘एनाफीलिज़’ मच्छर गंदे और दूषित पानी में पनपते हैं जो उड़कर हम तक पहुंचते हैं। डेंगू के मच्छर का काटने का समय जहां सूर्यास्त से पहले होता है वहीं, मलेरिया फैलाने वाले मच्छर सूर्यास्त के बाद काटते हैं। इन्हीं सब चीजों के प्रति सचेत रहने और खुद को इस रोग से बचाने के लिए हर साल 25 अप्रैल को विश्वभर में मलेरिया दिवस मनाया जाता है। यूनिसेफ द्वारा इस दिन को मनाने का उद्देश्य मलेरिया जैसे रोग पर जनता का ध्यान केंद्रित करना था, , जिससे हर साल लाखों लोग मरते हैं। इस मुद्दे पर विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम चलाने से बहुत सी जानें बचाई जा सकती हैं।

आमतौर पर मलेरिया का रोग अप्रैल से शुरू हो जाता है लेकिन जुलाई से नवंबर के बीच में यह रोग अपने चरम पर होता है। यानि कि इसी दौरान लाखों लोग इसकी चपेट में आते हैं।

मनुष्यों मे मलेरिया, प्लास्मोडियम की पाँच विभिन्न प्रजातियों के द्वारा फैलता है जो क्रमशः प्लास्मोडियम फैल्सीपैरम, प्लास्मोडियम वाईवैक्स, प्लास्मोडियम ओवेल, प्लास्मोडियम मलेरी तथा प्लास्मोडियम नोंलेसी है| मलेरिया का संचरण मादा एनाफीलिज़ मच्छर के द्धारा होता है, जो कि भौगोलिक क्षेत्र तथा क्षेत्रीय जलवायु पर पूणतः निर्भर करता है| मलेरियाग्रस्त व्यक्ति यदि इलाज को लेकर जरा सी भी चूक करता है तो वह कई तरह अन्य तरह से हानिकारक साबित हो सकती है। जिसमें से एक है मस्तिष्काघात।

मलेरिया के दौरान मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ना या दिमागी रूप से विकार पैदा होना भी एक समस्या है। मलेरिया ACT प्लास्मोडियम फैल्सीपैरम से होने वाला स्वरूप सबसे खतरनाक होता है। यदि मलेरिया प्लामज्मोडियम के परजीवी दिमाग में पहुंच जाते है तो मलेरियाग्रस्त व्यक्ति को ब्रेन हैमरेज हो सकता है। मलेरिया फैलाने वाले प्रोटोजोआ प्लास्मोडियम फैल्सीपैरमका शरीर पर इतना प्रभाव पड़ता है कि इससे मनुष्य न सिर्फ अपनी याददाश्त खो सकता है बल्कि चक्कर आने और बेहोशी की हालात का भी शिकार हो सकता है। दरअसल, मस्तिष्क मलेरिया एक ऐसी गंभीर बीमारी है जिसमें परजीवी

मस्तिष्क के ऊतकों के जरिए रक्त पहुंचाने वाली कोशिकाओं को प्रभावित करते हैं। इसकी जांच करना काफी मुश्किल होता है क्योंकि मरीज या तो बेहोश हो सकता है या वह गंभीर रूप से बीमार हो सकता है। इस रोग से बचने के लिए क्विनीन नमक दवा उपयोग में लाई जाती थी । मलेरिया के परजीवी को मारने में अब इस दवा का प्रभाव एकदम खतम होता जा रहा है। बीतें कुछ वर्षों में एक अदभुत पौधा-किंघाऊँ अर्थात

” हॉर्टिकल्चर (बागवानी) विभाग, डॉ राजेंद्र प्रसाद सेंट्रल कृषि विश्वविद्यालय, पूसा समस्तीपुर, बिहार

± मोर्फोजेनेसिस प्रयोगशाला, वनस्पति विज्ञान विभाग, विज्ञान संस्थान, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, उत्तर प्रदेश  कृषि उत्कर्ष

आर्टिमिसिया एनुआ प्रकाश में आया है जिसके अंदर पाये जाने वाले आर्टिमिसिनिन नामक जैव-सक्रिय पदार्थ को मलेरिया की दवा बनाने में लाभकारी पाया गया है। बता दें कि यह पौधा स्वीट वार्मवुड और स्वीट एनी के नाम से भी जाना जाता है। चीन में सर्वप्रथम मलेरिया की दवा बनाने में इस पौधे का प्रयोग किया गया जिसे वहाँ कि एक महिला वैज्ञानिक यू यू तू ने सर्वप्रथम खोजा था। उनके इस कार्य के लिए उन्हें 2015 में नोबल पुरुस्कार भी दिया गया। अब विश्व स्वस्थ्य संघठन ने भी इस पौधे को प्रसारित करने हेतु योजनाएं चलाई है। करीब दो दशक पहले भारतीय वैज्ञानिकों का एक दल चीन गया हुआ था। वहां पहुंचने पर वैज्ञानिकों को इस पौधे के गुणों के बारे में पता चला। चीनी लोगों ने बताया कि डेढ़ हजार साल पहले से ही यहां के लोग इस पौधे का इस्तेमाल मलेरिया रोग के उपचार में करते हैं। इन गुणों को देखते हुए भारतीय वैज्ञानिकों ने इस पौधे पर शोध कार्य करना शुरू किया। लखनऊ स्थित केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान एवं काशी हिन्दू विश्व विद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग में बीते कुछ वर्षो से इस पौधे पर शोध कार्य किये जा रहे है ताकि इससे भारतीय जलवायु में ज्यादा से ज्यादा आर्टेमिसीनिन पैदा किया जा सके। दुनियां भर में इस पौधे की सुखी पत्तियों से मलेरिया रोधी दवा तैयार की जाती है। इस दवाई की वार्षिक मांग 130 मीट्रिक टन के आस पास है जिसकी प्रतिपूर्ति चीन और भारत करता है। भारत की दवा कंपनी पहले इस दवा का कच्चा माल (सुखी पत्तियां) चीन से आयात करती थी।

आर्टिमिसिया की सफल खेती के लिए उचित जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टियाँ उपयुक्त होती है। इसका बीज बहुत छोटा होता है। इसलिए इसकी पौध तैयार कर खेत में पौध रोपण करना अच्छा होता है। एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 150 वर्गफुट भूमि में नर्सरी तैयार करना होता है। चयनित खेत में पहले सड़ी हुई गोबर की खाद समान रूप से बिखेर कर खेत की जुताई करें एवं मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए। अब खेत को छोटी-छोटी क्यारियों में विभाजित कर लें तथा सिंचाई हेतु नालियां बना लेना चाहिए। प्रति हेक्टेयर 20 ग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है। फफूंदनाशक दवा से बीज उपचार करने के पश्चात बीज को उचित मात्रा में बालू या भूर भुरी गोबर की खाद अथवा राख के साथ मिलाकर क्यरियों में समान रूप से छिड़कना चाहिए | बीज बोने के बाद ऊपर से केंचुआ खाद या फिर बारीक़ गोबर की खाद छिड़क कर हल्की सिंचाई कर देना चाहिए। इसकी पौध लगभग 50 से 60 दिन में पौध रोपाई हेतु तैयार हो जाती है।

पौध रोपण के समय सावधानियां

आर्टेमिसिया की खेती के लिए मुख्य खेत जिसमे पौध रोपण करना है, की भली भांति गहरी जुताई कर उसमे पाटा चलाकर समतल कर लेना चाहिए। अंतिम जुताई के पूर्व अच्छी प्रकार से सड़ी हुई गोबर की खाद (5-6 टन प्रति हेक्टेयर) खेत में मिला देना चाहिए। आर्टिमिसिया की पौध 50-60 दिन की होने पर उसे खेत में कतार से कतार 50 सेमी तथा पौध से पौध 30 सेमी की दूरी पर रोपन कर हल्की सिंचाई कर देना चाहिए। उत्तम पैदावार लेने के लिए पर्याप्त मात्रा में खाद एवं उर्वरकों की आवश्यकता होती है, जोकि भूमि के प्रकार पर निर्भर करती है। सामान्यतौर पर 150 किग्रा नाइट्रोजन, 50 किग्रा फॉस्फोरस एवं 50 किग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर देना उचित रहता है। उक्त नाइट्रोजन की आधी तथा फॉस्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा खेत की अंतिम तैयारी के समय छिडकें अथवा रोपाई के समय कतार में देना चाहिए। नाइट्रोजन की शेष मात्रा को 2-3 बार में सिंचाई के साथ देना चाहिए।

सारणी १: आर्टिमिसिया एनुआ की सफल खेती मृदा बलुई दोमट मिट्टी खेती के लिए

नर्सरी का क्षेत्रफल

एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 150 वर्गफुट भूमि में नर्सरी

फ़रवरी के माह में

की मात्रा

20 ग्राम बीज प्रति हेक्टेयर

जैव खाद

कटाई का समय

कुल उत्पादन

150 किग्रा नाइट्रोजन, 50 किग्रा फॉस्फोरस एवं 50 किग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद (5-6 टन प्रति हेक्टेयर खेत) पहली कटाई मई के अंत में, दूसरी कटाई जुलाई अंत से अगस्त के प्रथम सप्ताह में, तीसरी कटाई सितम्बर के मध्य में 450-475 क्विंटल ताज़ी हरी पत्तियां प्रति हेक्टेयर

सिंचाई एवं खरपतवार नियंत्रण

पौध रोपण के तुरंत बाद हल्की सिंचाई की जाती है। इसके बाद मौसम एवं मृदा प्रकार के आधार पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें। दीमक प्रभावित क्षेत्रों में फसल सुरक्षा के लिए क्लोरोपाइरीफॉस दवा 1-1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से सिचाई के समय प्रयोग करना चाहिए। खरपतवार मुक्त फसल रखने के लिए एक माह बाद खेत में 1-2 निराई-गुड़ाई खुरपी या हैंड हो की सहायता से करना आवश्यक है। जलभराव वाली जगह में आर्टिमिसिया कि खेती नहीं करनी चाहिए| गर्मी के मौसम में 10 -15 दिनों में सिंचाई करनी चाहिए लेकिन यह ध्यान देना चाहिए कि ज्यादा पानी न भर पाए। ज्यादा पनि इस फाल के लिए हानिकारक है।

शुष्क मौसम में करें पौधे की कटाई

आर्टिमिसिया की पत्तियां एवं इसके पुष्पगुच्छ में ज्यादा मात्र में आर्टेमिसीनिन होती है इसिलिया ये ही आर्थिक महत्त्व की होती है। आर्टेमिसिया की पत्तियों से तेल भी प्राप्त होता है। इसकी कटाई के समय मौसम शुष्क एवं बादल रहित होना चाहिए। उत्तर भारत में पहली कटाई मई के अंत में (बोने के 95-100 दिन बाद), दूसरी कटाई जुलाई अंत से अगस्त के प्रथम सप्ताह

अंक सातः, जनवरी – मार्च: 2021

(बोने के 145-150 दिन बाद ) तथा तीसरी कटाई सितम्बर के मध्य में (बुवाई के 190- 200 दिन बाद) करना चाहिए। पौधों की कटाई दांतेदार तेज धार वाले हँसिया से भूमि की सतह से 30 सेमी की ऊंचाई से ही (नीचे से एक फुट छोड़कर) करना चाहिए।

किसानो के लिये आर्थिक उपज है इसकी खेती

आर्टिमिसिया फसल की तीन कटाइयों में 450- 475 क्विंटल ताज़ी हरी पत्तियां प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है, जिसे छाया में सुखाने पर 40-50 क्विंटल सूखी पत्ती प्राप्त हो जाती है। उपज पूर्णतः मौसम एवं उत्पादन तकनीक पर निर्भर करती है। इसके पौधों को खेत से काटकर साफ़ एवं शुष्क स्थान पर छाया में अच्छी प्रकार सुखाकर पत्तियों को डंठल से अलग कर लेते है। इसके बाद इन्हे पुनः सुखाकर जूट के बोरों में भरकर विक्रय हेतु भेज देना चाहिए | मध्य प्रदेश के रतलाम स्थि इप्का लेबोरेटरी बड़ी तायदाद में इस दवाई का निर्माण किया जा रहा है। आर्टिमिसिया पौधों की एक टन सुखी पत्तियों से चार किलो दवाई बनाई जाती है। औषधीय खेती आर्टिमिसिया का मार्केट भी अलग है। अन्य फसलों में मेहनत कर कटाई करने के बाद उत्पादन को बाजार ले जाकर सस्ती कीमतों पर बेचना पड़ता है। जिससे किसान फसल बाजार तक ले जाने में किराया और खर्च भी अदा करते हैं। लेकिन आर्टिमिसिया की बिक्री घर बैठे ही हो जाती है। इसे किसी बाजार में ले जाने की जरूरत नहीं। इसके लिये पहले से ही आयुर्वेदिक कंपनियों से बात करने पर उनके एजेंट गांव में आकर किसानों की फसल खरीद लेते हैं। यहां तक कि फसल तैयार होने से पहले ही इसकी एडवांस बुकिंग तक जाती है। फसल तैयार होते ही एजेंट इसे खरीदकर ले जाते हैं। आर्टिमिसिया की खेती से किसान को कम समय में लाखों रुपए का मुनाफा हो सकता है।

 

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