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वाराणसीः अन्तर-सांस्कृतिक अध्ययन केन्द्र एवं मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र के संयुक्त तत्वावधान में दो विशिष्ट व्याख्यानों का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता पक्षधर पत्रिका के संपादक एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रो. विनोद तिवारी थे। प्रो. विनोद तिवारी ने अपने प्रथम व्याख्यान कथावाचक और श्रोता विषय पर बोलते हुए कहा कि पूर्व प्रौद्योगिक समाज और वर्तमान औद्योगिकीय युग में लेखक, पाठक और श्रोता के बीच के अंतरसंबंध पर गंभीरता से विचार किया गया है। प्रारम्भ से ही हिन्दी साहित्य में श्रोताओं की भूमिका को भी अपने रचनाकर्म में साहित्यकारों द्वारा ध्यान में रखा गया है जैसा कि हम तुलसी जैसे महान साहित्यकारों कि रचना में स्पष्ट रूप से पाते हैं।

कथावाचन एक प्रकार से बातचीत का ही विस्तार है जिसमें श्रोताओं की उपस्थिति अनिवार्य है। भारत और विश्व के प्रत्येक देश में कथावाचन, दास्तानगोई, हमजागोई, ओरुकी आदि कई नाम से कथा या किस्सागोई की परंपरा रही है जो तत्समाज की सांस्कृतिक विशेषता को भी प्रकट करती है। कहानी या कहन या आख्यान मनुष्य का स्वाभाविक गुण है।

दैवीय-मानवीय सम्बन्धों का रूपायन, यात्रा-वृतांत, विज्ञान संबंधी कथाएँ, प्रकृति का निरूपण इत्यादि कथाओं का आधार होते हैं। लतीफे, चुटकुले, व्यंग्य आदि भी कथा या आख्यान का रोचक स्वरूप हैं। आधुनिक काल में कहन या आख्यान को रोचक ढंग से कहने की नई विधाएँ विकसित हुयी हैं।

वाचिक, प्रदर्शित और मुद्रित–कथा के तीनों रूपों में किसी घटना को प्रस्तुत करने की महत्वपूर्ण युक्ति होती है। अनुभूतिकरण, क्रमिकता, कालवाचिकता, परिदृश्य चित्रण आदि कथा के महत्वपूर्ण आयाम हैं। के. अयप्पन पन्निकड ने नारिकेलोपाख्यान के रूपक के माध्यम से कथारस के महत्व को बताया है। अपने द्वितीय व्याख्यान लेखक और पाठक विषय पर बोलते हुए प्रो. तिवारी ने कहा कि कथा और काव्य दोनों प्रकार की विधाओं में विभिन्न साहित्यकारों ने स्पष्ट रूप से पाठकों को संबोधित किया है।

पाठकों के प्रति उद्बोधन साहित्यकारों की रचनाओं की बुनावट में स्पष्ट रूप से परिलक्षित भी होता है। प्रत्येक साहित्यकार के मन में रचना के समय पाठक स्पष्ट और अनिवार्य रूप से समक्ष उपस्थित होता है। आधुनिक काल के प्रमुख यूरोपीय साहित्यकार आइजर ने अपनी रीडर-रेस्पोंस थ्योरी में लेखक के महत्व की जगह पाठक के महत्व को स्थापित किया।

आज सोशल मीडिया के दौर में प्रत्येक पाठक, आलोचक भी हो गया है। देवीशंकर अवस्थी ने पढ़त या पाठन को एक सक्रिय प्रक्रिया कहा है। इटली के विचारक अमरतो इको ने अपने लेखन के माध्यम से पाठक के महत्व को रुपायित  किया है। उन्होंने कहा कि पूर्व औद्योगिक समाजों में गलत और भ्रांतिपूर्ण तथ्यों का सृजन कठिन था जो आज के आधुनिक मीडिया के दौर में काफी आसान हो गया है

कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए अन्तर-सांस्कृतिक अध्ययन केन्द्र के समन्वयक प्रो. राजकुमार ने कहा कि आख्यान के सन्दर्भ में इतना अच्छा व्याख्यान मैंने अब तक नहीं सुना था। इस व्याख्यान ने ज्ञान के कई नए आयामों को हमारे समक्ष खोला। हम डॉ. तिवारी को भविष्य में पुनः इस व्याख्यान श्रृंखला को आगे बढ़ाने के लिये आमंत्रित करना चाहेंगे। कार्यक्रम संचालन और स्वागत मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र के डॉ. राजीव कुमार वर्मा ने किया। कार्यक्रम में प्रो. वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी, प्रो. चंद्रकला त्रिपाठी, प्रो. नीरज खरे, प्रो. अर्चना कुमार, डॉ. धर्मजंग, डॉ. प्रीति त्रिपाठी, डॉ. सुबोध श्रीवास्तव, डॉ. रमेश लाल एवं शोधर्थीगण रंजीत, दिव्यान्शी, अनन्या, नेहा, रिमी, चन्दन, अंजलि समेत बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित थे I

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